lirik lagu dhyan dinesh - nazariya
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जिसको मैं धूप समझता था पहले
वो सूरज की उल्फ़त थी
जिसको मैं झरना समझता था पहले
वो नदियों की आज़ादी थी
अपनी परेशानियों का नज़रिया जब बदला
तो जाना मैं ख़ुशक़िस्मत था
आधे~पौने लम्हों को जीने में अब तो अलग सा
मज़ा है आने लगा
नज़रिया मेरा
सारे ग़मों को भुला कर है देखा
क्या होती है ये ज़िंदगी
नज़रिया मेरा
औरों को थोड़ा हँसाकर है जाना
क्या होती है ये ख़ुशी
अंधेरी सी कोई रात हो
तो चाँदनी का साथ हो
चाहे रात हो अमावसी
तो सुबह की पहली धूप सही
हाँ अनजाने हालात से घबराते क्यूँ
वो हसीन पल भी अनजाने ही थे
मैंने सुना एक चीज़ को कहते नसीब
बदलती नहीं है कभी
हर एक लम्हे का मैंने शुक्र है माना
तो समझा नसीब है क्या
नज़रिया मेरा
सारे ग़मों को भुला कर तो देखो
क्या होती है ये ज़िंदगी
नज़रिया मेरा
औरों को थोड़ा हँसाकर तो देखो
क्या होती है ये ख़ुशी
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